देहरादून। उत्तराखंड में बच्चों और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य तथा विकास से जुड़ी समस्याओं को लेकर सामने आई एक अध्ययन रिपोर्ट ने स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा व्यवस्था और सरकारी सहायता योजनाओं की पहुंच पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में 0 से 17 वर्ष तक के करीब 35,746 बच्चों और किशोरों में बौद्धिक दिव्यांगता, विशिष्ट अधिगम अक्षमता, ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD), अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर (ADHD), चिंता और अवसाद जैसी समस्याओं से प्रभावित होने का अनुमान लगाया गया है।

यह अध्ययन नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेज (NIMHANS), बेंगलुरु की ओर से उत्तराखंड राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण और राजकीय दून मेडिकल कॉलेज के सहयोग से किया गया। वित्तीय वर्ष 2024-25 की रिपोर्ट में बच्चों की मानसिक एवं विकासात्मक समस्याओं के अनुमानित प्रसार के साथ-साथ अभिभावकों में दिव्यांगता संबंधी अधिकारों, प्रमाणपत्रों और सरकारी सहायता योजनाओं के प्रति जागरूकता की स्थिति का भी आकलन किया गया है।
रिपोर्ट के निष्कर्ष बताते हैं कि चुनौती केवल बच्चों की समस्याओं की समय पर पहचान और उपचार तक सीमित नहीं है, बल्कि परिवारों को उपलब्ध सुविधाओं और सहायता प्रणालियों से जोड़ना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। अध्ययन में स्वास्थ्य और शिक्षा विभाग के बीच बेहतर समन्वय, स्कूलों में प्रारंभिक पहचान की व्यवस्था तथा प्रशिक्षित विशेषज्ञों की उपलब्धता बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया गया है।

चार जिलों में हुआ सर्वे, 802 बच्चों के आंकड़ों का विश्लेषण
यह सर्वेक्षण देहरादून, पौड़ी गढ़वाल, अल्मोड़ा और नैनीताल जिलों के ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में किया गया। अध्ययन के लिए कुल 80 क्लस्टर चुने गए थे और प्रत्येक क्लस्टर से 11 पात्र बच्चों को शामिल करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। इस तरह कुल 880 प्रतिभागियों का लक्ष्य रखा गया, जबकि अंतिम विश्लेषण में 802 बच्चों और किशोरों के आंकड़े शामिल किए गए।
जानकारी मुख्य रूप से बच्चों के अभिभावकों से एकत्र की गई। आवश्यकता के अनुसार बच्चों से भी बातचीत की गई। अध्ययन में प्राप्त निष्कर्षों के आधार पर राज्य की बाल जनसंख्या के लिए विभिन्न समस्याओं से प्रभावित बच्चों की अनुमानित संख्या निकाली गई।
रिपोर्ट में जनगणना 2011 के आंकड़ों का उपयोग किए जाने का उल्लेख है। इसलिए 35,746 बच्चों का आंकड़ा सर्वेक्षण में प्रत्यक्ष रूप से पहचाने गए बच्चों की कुल संख्या नहीं, बल्कि अध्ययन के निष्कर्षों और जनसंख्या संबंधी अनुमानों के आधार पर निकाला गया आंकड़ा है। भविष्य में अद्यतन जनसंख्या संबंधी आंकड़ों के आधार पर इन अनुमानों में बदलाव संभव है।
बौद्धिक दिव्यांगता के सर्वाधिक अनुमानित मामले
अध्ययन में बौद्धिक दिव्यांगता से प्रभावित बच्चों और किशोरों की अनुमानित संख्या करीब 14,790 बताई गई है। ऐसी स्थिति में बच्चों को उनकी व्यक्तिगत जरूरतों के अनुसार सीखने, संवाद करने, दैनिक गतिविधियों और सामाजिक भागीदारी में अतिरिक्त सहायता की आवश्यकता हो सकती है।
रिपोर्ट के अनुसार, इस श्रेणी के मूल्यांकन के लिए 6 से 17 वर्ष की आयु के 601 बच्चों का आकलन किया गया, जिनमें छह बच्चों में विशेषज्ञ स्तर पर निदान की पुष्टि हुई।
विशिष्ट अधिगम अक्षमता यानी स्पेसिफिक लर्निंग डिसेबिलिटी (SLD) के आकलन के लिए 8 से 17 वर्ष के 508 बच्चों का मूल्यांकन किया गया। इनमें छह बच्चों में निदान की पुष्टि हुई।
यहां ध्यान देने वाली बात है कि सर्वेक्षण में विशेषज्ञ स्तर पर पुष्टि किए गए मामलों की संख्या और राज्य स्तर पर अनुमानित प्रसार अलग-अलग आंकड़े हैं। इसलिए दोनों को एक-दूसरे के समान नहीं समझा जाना चाहिए।
चिंता और अवसाद से लेकर ऑटिज्म और ADHD तक के अनुमान
रिपोर्ट में अलग-अलग मानसिक एवं विकासात्मक स्थितियों से प्रभावित बच्चों और किशोरों की अनुमानित संख्या भी दी गई है।
- बौद्धिक दिव्यांगता: लगभग 14,790 बच्चे और किशोर।
- चिंता और अवसाद: लगभग 5,067 बच्चे और किशोर।
- ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD): लगभग 2,445 बच्चे और किशोर।
- अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर (ADHD): लगभग 1,075 बच्चे और किशोर।
ये आंकड़े रिपोर्ट में दिए गए अनुमान हैं। इन्हें राज्य के सभी बच्चों का व्यक्तिगत चिकित्सकीय निदान नहीं माना जाना चाहिए। किसी बच्चे में मानसिक स्वास्थ्य या विकास संबंधी समस्या की पुष्टि के लिए प्रशिक्षित विशेषज्ञ द्वारा उचित मूल्यांकन आवश्यक है।
विशेषज्ञों के अनुसार, लगातार चिंता, अत्यधिक डर, लंबे समय तक उदासी, सामाजिक संवाद में कठिनाई, ध्यान केंद्रित करने में परेशानी या व्यवहार में असामान्य बदलाव जैसे संकेतों पर ध्यान देना जरूरी है। हालांकि, किसी एक लक्षण के आधार पर किसी बच्चे को मानसिक या विकासात्मक विकार से प्रभावित नहीं माना जा सकता।
दिव्यांगता संबंधी सरकारी योजनाओं की जानकारी का अभाव
रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष अभिभावकों के बीच दिव्यांगता संबंधी अधिकारों और सरकारी सहायता योजनाओं की सीमित जानकारी है। अध्ययन में अवसाद के बारे में जानकारी रखने वाले लोगों का अनुपात 78.16 प्रतिशत बताया गया, जबकि बौद्धिक दिव्यांगता के बारे में जानकारी रखने वालों का अनुपात 12.15 प्रतिशत और ADHD के बारे में जानकारी रखने वालों का अनुपात केवल 5.40 प्रतिशत रहा।
ये आंकड़े मानसिक स्वास्थ्य के अलग-अलग विषयों के प्रति जागरूकता में अंतर को दर्शाते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, बच्चों की समस्याओं की पहचान के साथ परिवारों को यह जानकारी देना भी आवश्यक है कि मूल्यांकन कहां कराया जा सकता है और जरूरत पड़ने पर किस प्रकार की सहायता उपलब्ध है।
विशेष रूप से दिव्यांगता प्रमाणपत्र, यूनिक डिसेबिलिटी आईडी (UDID) कार्ड और संबंधित सरकारी योजनाओं की जानकारी का अभाव परिवारों के लिए सहायता प्राप्त करने में बाधा बन सकता है।
UDID कार्ड के बारे में जागरूकता बेहद कम
रिपोर्ट में UDID और दिव्यांगता प्रमाणपत्र से संबंधित जानकारी की स्थिति भी सामने आई है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, इस संबंध में जानकारी एकत्र किए गए 385 अभिभावकों में से केवल 0.26 प्रतिशत को UDID के बारे में जानकारी थी। किसी भी अभिभावक को UDID से मिलने वाले लाभों की जानकारी नहीं थी।
दिव्यांगता का आकलन कहां कराया जाता है, इसकी जानकारी रखने वाले अभिभावकों का अनुपात 3.64 प्रतिशत था। केवल 1.04 प्रतिशत अभिभावकों ने बच्चे का आकलन कराने की बात कही, जबकि 0.78 प्रतिशत के पास दिव्यांगता प्रमाणपत्र होने का उल्लेख किया गया।
अध्ययन में दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016, मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017, राष्ट्रीय न्यास अधिनियम, 1999 और किशोर न्याय अधिनियम, 2015 के बारे में भी जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता रेखांकित की गई है।
ये निष्कर्ष संकेत देते हैं कि सरकारी सहायता का लाभ तभी प्रभावी ढंग से पहुंच सकता है, जब परिवारों को पात्रता, आवेदन प्रक्रिया, मूल्यांकन केंद्र और संबंधित सेवाओं की जानकारी उपलब्ध हो।

इलाज के लिए सरकारी अस्पतालों पर निर्भर हैं अधिकांश परिवार
अध्ययन में स्वास्थ्य सेवाओं के उपयोग से संबंधित जानकारी भी एकत्र की गई। रिपोर्ट के अनुसार, सामान्य बीमारियों के उपचार के लिए 66.21 प्रतिशत परिवारों ने सरकारी या नगर निगम के अस्पतालों का सहारा लेने की बात कही।
मानसिक या न्यूरोलॉजिकल समस्याओं के उपचार के लिए सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों पर निर्भरता 65.83 प्रतिशत बताई गई, जबकि 32.04 प्रतिशत परिवारों ने निजी अस्पतालों या डॉक्टरों पर निर्भर रहने की जानकारी दी।
इसके विपरीत, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी सेवाओं या जानकारी के लिए स्वास्थ्य केंद्र अथवा डॉक्टर के पास जाने वाले परिवारों का अनुपात केवल 2.36 प्रतिशत बताया गया। करीब 99.39 प्रतिशत अभिभावकों ने कहा कि उन्होंने युवा-केंद्रित स्वास्थ्य क्लीनिकों के बारे में न तो सुना था और न ही उनका उपयोग किया था।
यह स्थिति मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के बारे में जागरूकता बढ़ाने, उपलब्ध सुविधाओं की जानकारी लोगों तक पहुंचाने और जरूरतमंद परिवारों को उपयुक्त स्वास्थ्य संस्थानों से जोड़ने की आवश्यकता को रेखांकित करती है।

स्कूलों और स्वास्थ्य केंद्रों में शुरुआती पहचान पर जोर
रिपोर्ट में बच्चों की मानसिक एवं विकासात्मक समस्याओं की शुरुआती पहचान को मजबूत करने के लिए कई सुझाव दिए गए हैं। इनमें राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (RBSK), स्कूल मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों और टीकाकरण सत्रों के साथ उपयुक्त स्क्रीनिंग व्यवस्था को जोड़ना शामिल है।
इसके साथ ही आशा कार्यकर्ताओं, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं, सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारियों, प्राथमिक स्वास्थ्य कर्मियों और शिक्षकों को प्रशिक्षित करने की सिफारिश की गई है, ताकि वे संभावित समस्याओं के संकेत पहचानकर बच्चों को समय पर विशेषज्ञों के पास भेज सकें।
स्कूलों में विशेष शिक्षकों की उपलब्धता बढ़ाने, परामर्श सेवाएं विकसित करने, रेफरल व्यवस्था को मजबूत करने और समावेशी शिक्षा को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया गया है।
विशेषज्ञों द्वारा समय पर मूल्यांकन होने से बच्चों की व्यक्तिगत जरूरतों को बेहतर ढंग से समझने और उनके लिए उपयुक्त शैक्षणिक एवं चिकित्सकीय सहायता निर्धारित करने में मदद मिल सकती है।

परिवारों तक पहुंचाई जाए सरकारी सहायता की जानकारी
रिपोर्ट में यह भी सुझाव दिया गया है कि UDID कार्ड, दिव्यांगता प्रमाणपत्र, आवेदन प्रक्रिया, जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम, हेल्पलाइन और उपलब्ध सहायता सेवाओं के बारे में परिवारों को स्पष्ट जानकारी दी जाए।
ग्रामीण और पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले परिवारों के लिए ऐसी जानकारी विशेष रूप से उपयोगी हो सकती है, जहां विशेषज्ञ सेवाओं तक पहुंचने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ सकती है। स्थानीय स्वास्थ्य कर्मियों और शिक्षकों के माध्यम से परिवारों को सही संस्थान तक पहुंचाने की व्यवस्था भी इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
इसके लिए स्वास्थ्य विभाग, शिक्षा विभाग, सामाजिक कल्याण से जुड़ी एजेंसियों और स्थानीय प्रशासन के बीच समन्वय की आवश्यकता होगी। केवल स्क्रीनिंग तक सीमित रहने के बजाय बच्चों को आगे के मूल्यांकन, उपचार, शैक्षणिक सहायता और पात्र सरकारी योजनाओं से जोड़ना भी जरूरी है।

अब चुनौती अनुमान से आगे बढ़कर जमीनी सहायता पहुंचाने की
उत्तराखंड में किए गए इस अध्ययन से बच्चों और किशोरों के मानसिक एवं विकासात्मक स्वास्थ्य की स्थिति को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण आधार उपलब्ध होता है। हालांकि, इसके निष्कर्षों को प्रभावी कार्रवाई में बदलना अब सबसे बड़ी चुनौती होगी।
समय पर पहचान, विशेषज्ञों की उपलब्धता, स्कूलों में सहयोग, अभिभावकों की जागरूकता और सरकारी सहायता योजनाओं तक आसान पहुंच ऐसे प्रमुख क्षेत्र हैं, जिन पर ध्यान देने की आवश्यकता है।
रिपोर्ट में सामने आए 35,746 बच्चों के अनुमान को केवल एक संख्या के रूप में देखने के बजाय इससे जुड़ी सेवाओं की जरूरतों को समझना महत्वपूर्ण है। यदि बच्चों की समस्याओं की समय पर पहचान हो, परिवारों को उचित मार्गदर्शन मिले और स्वास्थ्य एवं शिक्षा व्यवस्था मिलकर काम करे, तो जरूरतमंद बच्चों को उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप सहायता उपलब्ध कराने की दिशा में ठोस प्रगति की जा सकती है।