नई दिल्ली। दिल्ली में विरोध प्रदर्शन कर रहे लोगों को हिरासत में लेने, मेट्रो सेवाओं पर प्रतिबंध और शहर में आवाजाही बाधित होने से संबंधित याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने विशेष सुनवाई की। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी व्यक्ति को निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना हिरासत में नहीं लिया जाना चाहिए। साथ ही, प्रतिबंधित क्षेत्रों के बाहर शांतिपूर्ण और बिना हथियारों के एकत्र हुए लोगों के खिलाफ मनमानी कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए।


न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने सुनवाई के दौरान सार्वजनिक परिवहन सेवाओं, इंटरनेट कनेक्टिविटी और नागरिकों की आवाजाही से जुड़े मुद्दों पर निर्देश दिए। अदालत ने कहा कि मेट्रो और रेल सेवाएं सामान्य रूप से चलती रहनी चाहिए, जब तक कि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए किसी प्रतिबंध की वास्तविक आवश्यकता न हो। शहर में यातायात नियमों के अनुरूप लोगों की स्वतंत्र आवाजाही सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया गया।
बैरिकेडिंग की तत्काल समीक्षा के निर्देश
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने शहर में जगह-जगह लगाए गए बैरिकेड्स पर भी विचार किया। पीठ ने कहा कि वह हर स्थान पर बैरिकेडिंग किए जाने के पक्ष में नहीं है। अदालत ने संबंधित अधिकारियों को कानून-व्यवस्था और यातायात की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए बैरिकेडिंग की तत्काल समीक्षा करने का निर्देश दिया।
अदालत ने यह भी कहा कि इंटरनेट सेवाओं में कोई व्यवधान नहीं होना चाहिए। सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ को बताया कि दिल्ली मेट्रो पूरी तरह संचालित है और पिछली रात 10 बजे से सभी स्टेशन खुले हैं। उन्होंने यह भी भरोसा दिलाया कि ट्रेन सेवाएं चालू हैं और इंटरनेट कनेक्टिविटी बहाल कर दी गई है।
हिरासत और पुलिस कार्रवाई पर वकीलों ने उठाए सवाल
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने प्रदर्शनकारियों और वकीलों को कथित रूप से हिरासत में लिए जाने तथा पुलिस कार्रवाई के तरीकों पर चिंता जताई। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने हिरासत और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 लागू किए जाने से संबंधित मुद्दे उठाए। उन्होंने लोगों को ट्रेनों से हिरासत में लिए जाने और इंटरनेट सेवाएं निलंबित किए जाने के आरोपों का भी उल्लेख किया।
वरिष्ठ अधिवक्ता शाहदान फरासत ने कथित तौर पर प्रदर्शनकारियों को खींचकर बसों में बैठाने की घटनाओं पर अदालत का ध्यान आकर्षित किया। वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन ने कहा कि नागरिकों की शहर में स्वतंत्र रूप से घूमने की क्षमता प्रभावित हुई है। उन्होंने वकीलों को हिरासत में लिए जाने का मुद्दा भी उठाया।
वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने जंतर-मंतर के बाहर वकीलों के खिलाफ हुई कथित पुलिस कार्रवाई के वीडियो अदालत के समक्ष प्रस्तुत किए जाने का उल्लेख किया। उन्होंने अनुरोध किया कि वकीलों और अन्य लोगों के साथ कथित हिंसा से संबंधित वीडियो देखे जाएं और जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय की जाए।
शंकरनारायणन ने अदालत से शहर में स्वतंत्र आवाजाही बहाल करने और सभी बैरिकेड हटाने का निर्देश देने की मांग की। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदर्शन स्थल पर बिना पहचान चिह्न वाले पुलिसकर्मी भी मौजूद थे। वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े ने भी दलील दी कि वकीलों को अपने मुवक्किलों की सहायता करने से रोका जा रहा है और उन्हें प्राथमिकी दर्ज करने की धमकी दिए जाने के आरोप हैं।
मेट्रो स्टेशनों को बंद करने और यात्रियों को हिरासत में लेने का मामला
सुनवाई में दिल्ली मेट्रो स्टेशनों को बंद किए जाने और यात्रियों को हिरासत में लेने से जुड़े आरोप भी उठाए गए। वरिष्ठ अधिवक्ता शोएब आलम ने दावा किया कि कुछ लोगों को ट्रेनों से उतारकर हिरासत में लिया गया और प्रदर्शन स्थल तक पहुंचने से रोकने के लिए लोगों के घरों पर छापेमारी की गई।
उन्होंने प्रदर्शन करने के नागरिक अधिकार का हवाला देते हुए कथित हिरासतों पर सवाल उठाए। आलम के अनुसार, पूर्व मुख्यमंत्री सहित लगभग 6,000 से 7,000 लोगों को हिरासत में लिए जाने का दावा किया गया। हालांकि, इस संख्या की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बागची ने संबंधित अधिकारियों से मंगलवार तक मेट्रो स्टेशनों को बंद किए जाने के मामले में रिपोर्ट मांगे जाने की संभावना का उल्लेख किया। इस मुद्दे पर अदालत के समक्ष प्रस्तुत दलीलों का केंद्र यह था कि सार्वजनिक सेवाओं पर प्रतिबंध और पुलिस कार्रवाई कानूनी आधार तथा आवश्यक प्रक्रियाओं के अनुरूप होनी चाहिए।
BNSS की धारा 163 के आदेश से जुड़े बोर्ड को हटाने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि यदि अदालत के आसपास के क्षेत्र में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 लागू किए जाने से संबंधित बोर्ड पहले से नहीं हटाया गया है, तो उसे हटा दिया जाए। पीठ ने इस कदम को न्याय तक पहुंचने को लेकर किसी भी आशंका से बचने की आवश्यकता के संदर्भ में रखा।
यह सुनवाई वरिष्ठ अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की अवमानना याचिका सहित अन्य याचिकाओं पर हुई। याचिका में आरोप लगाया गया था कि सुप्रीम कोर्ट के 9 अक्टूबर के आदेश के बावजूद अधिकारियों ने मेट्रो स्टेशनों को बंद करने और ट्रेन सेवाओं पर रोक लगाने जैसी कार्रवाई की।
धारा 163 के तहत सक्षम प्राधिकारी कुछ परिस्थितियों में सार्वजनिक व्यवस्था और सुरक्षा बनाए रखने के लिए प्रतिबंधात्मक आदेश जारी कर सकता है। हालांकि, ऐसे आदेशों का इस्तेमाल और उनका क्रियान्वयन लागू कानून तथा न्यायिक निर्देशों के अनुरूप होना आवश्यक है।
Delhi CJP protest | The Supreme Court commences hearing on a batch of pleas over the government crackdown on protesters protesting in Delhi on October 10.
A bench of Justices Joymalya Bagchi and V. Mohana is hearing the pleas against detentions by the Delhi police and paramilitary forces of protesters and a contempt plea over allegedly wilfully disobeying orders. The Court has agreed to hear all the lawyers who wish to make mention of their respective pleas on protest cases.
“Two matters are before us. There are lawyers who wish to make an unlisted mention of pleas filed. What we purpose to do is to go from right to left (in the Bar) and give an opportunity to hear every party”, the Court said.
When counsels thanked SC for holding a special hearing on these issues, Justice Bagchi said “No need to thank us. We are always at the service of the nation”.
Senior Advocate Kapil Sibal begins submissions on a plea against detention and the order of imposition of Section 163.
They are picking up people from trains, etc. Then there is the issue of suspension of the Internet (which is covered—decided— in the Anuradha Bhasin case), Sibal says.
— ANI (@ANI) October 11, 2026
शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार पर अदालत में बहस
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने शांतिपूर्ण विरोध करने के नागरिकों के अधिकार का मुद्दा उठाया। उन्होंने सवाल किया कि क्या राज्य ने आपातकाल जैसी स्थिति लागू कर दी है। गुरुस्वामी ने दलील दी कि नागरिकों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार को बाधित किया गया है और इसकी तुलना 50 वर्ष पहले के आपातकालीन दौर से की।
अदालत में वकीलों की ओर से यह भी कहा गया कि शांतिपूर्ण ढंग से विरोध कर रहे लोगों को हिरासत में लेने तथा उनके आवागमन पर प्रतिबंध लगाने से नागरिक स्वतंत्रताओं पर असर पड़ता है। वहीं, अधिकारियों की ओर से सार्वजनिक व्यवस्था और सुरक्षा से संबंधित स्थिति पर पक्ष रखा गया।
सुनवाई की शुरुआत में पीठ ने कहा कि उसके सामने दो मामले हैं और वह सभी संबंधित पक्षों को सुनने का अवसर देना चाहती है। विशेष सुनवाई के लिए धन्यवाद दिए जाने पर न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि अदालत देश की सेवा के लिए हमेशा तत्पर है।
सार्वजनिक व्यवस्था और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन पर जोर
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की जरूरत और नागरिकों के मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन का मुद्दा प्रमुखता से सामने आया। अदालत ने कानूनी प्रक्रिया का पालन, शांतिपूर्ण जमावड़े के प्रति उचित दृष्टिकोण, सार्वजनिक परिवहन की निरंतरता, इंटरनेट सेवाओं की उपलब्धता और बैरिकेडिंग की समीक्षा जैसे विषयों पर निर्देश दिए।
मामले में पुलिस कार्रवाई, हिरासत और मेट्रो सेवाओं को लेकर लगाए गए आरोपों पर संबंधित अधिकारियों का पक्ष तथा अदालत में आगे होने वाली सुनवाई महत्वपूर्ण होगी। विशेष रूप से मेट्रो स्टेशनों को बंद किए जाने के संबंध में मांगी जाने वाली रिपोर्ट से घटनाक्रम और प्रशासनिक निर्णयों की स्थिति स्पष्ट होने की उम्मीद है।