ऊधम सिंह नगर: जसपुर के चर्चित इलेक्ट्रॉनिक्स एवं निवेश योजना विवाद में तृतीय अपर जिला न्यायाधीश मुकेश चंद्र आर्य की अदालत ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए एक सिविल अपील खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि केवल समझौतेनामे की फोटोकॉपी के आधार पर किसी व्यक्ति को वित्तीय देनदारियों से मुक्त नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर अदालत ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा।

वर्ष 2013-14 की निवेश योजना से जुड़ा है मामला
मामले के अनुसार, जसपुर निवासी नईम खान ने दावा किया था कि वर्ष 2013-14 में उसने शहजाद खान और मोहम्मद हासिम के साथ मिलकर शाइन स्टार इलेक्ट्रो वर्ल्ड प्राइवेट लिमिटेड और स्टार इलेक्ट्रॉनिक्स के नाम से इलेक्ट्रॉनिक्स निवेश योजनाएं संचालित की थीं।
इन योजनाओं के तहत लोगों से दैनिक और मासिक किस्तें जमा कराकर घरेलू इलेक्ट्रॉनिक सामान उपलब्ध कराया जाता था तथा प्रत्येक माह ड्रॉ भी निकाला जाता था। वादी का दावा था कि कारोबार में तीनों की बराबर की हिस्सेदारी थी।
समझौते की मूल प्रति पेश नहीं कर सका वादी
अपीलकर्ता का कहना था कि 30 जून 2015 को तीनों पक्षों के बीच पूरा हिसाब-किताब हो गया था और लिखित समझौते के अनुसार आगे की सभी देनदारियां शहजाद खान ने अपने जिम्मे ले ली थीं। बाद में जमाकर्ताओं द्वारा धन वापसी की मांग किए जाने पर उसने अदालत से घोषणा करने का अनुरोध किया कि उक्त तिथि के बाद उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं है।
हालांकि अदालत ने पाया कि जिस समझौते के आधार पर वादी स्वयं को देनदारी से मुक्त बता रहा था, उसकी मूल प्रति न्यायालय में प्रस्तुत नहीं की गई। केवल फोटोकॉपी दाखिल की गई और मूल दस्तावेज उपलब्ध न कराने का कोई संतोषजनक कारण भी नहीं बताया गया। इसके अलावा कथित हिसाब-किताब से संबंधित कोई विश्वसनीय रिकॉर्ड भी पेश नहीं किया गया।
इन परिस्थितियों में अदालत ने सिविल जज (जूनियर डिवीजन), जसपुर द्वारा 31 मई 2024 को दिए गए निर्णय को सही ठहराते हुए अपील खारिज कर दी।
गैर-पंजीकृत साझेदारी पर भी अदालत की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान प्रतिवादियों ने अदालत को बताया कि वे फर्म के साझेदार नहीं, बल्कि कर्मचारी थे और उनसे सादे स्टांप पेपर पर हस्ताक्षर कराए गए थे।
रिकॉर्ड का परीक्षण करते हुए अदालत ने यह भी पाया कि वादी स्वयं साझेदारी का दावा कर रहा है, जबकि संबंधित फर्म पंजीकृत नहीं थी। अदालत ने कहा कि भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 की धारा 69 के तहत गैर-पंजीकृत साझेदारी फर्म से जुड़े इस प्रकार के दावे विधिसम्मत नहीं माने जा सकते।
निचली अदालत का फैसला बरकरार
तृतीय अपर जिला न्यायाधीश ने निचली अदालत के निर्णय को बरकरार रखते हुए सिविल अपील निरस्त कर दी। साथ ही अदालत ने आदेश दिया कि मुकदमे का खर्च दोनों पक्ष स्वयं वहन करेंगे।