
सरकार के इस फैसले को तंबाकू से होने वाली बीमारियों और कैंसर की रोकथाम की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। हालांकि, प्रतिबंध लागू होने के बाद दुकानदारों, थोक विक्रेताओं और वितरकों के सामने मौजूदा स्टॉक के प्रबंधन की चुनौती खड़ी हो गई है। व्यापारियों का कहना है कि अचानक बिक्री बंद होने से उन्हें आर्थिक नुकसान हो सकता है। ऐसे में अब निगरानी, कार्रवाई और व्यापारियों के स्टॉक से जुड़े सवाल अहम हो गए हैं।

किन उत्पादों पर लगा है प्रतिबंध?
एफएसडीए ने खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 की धारा 30(2)(ए) और खाद्य सुरक्षा एवं मानक (विक्रय प्रतिषेध और निर्बंधन) विनियम, 2011 के विनियम 2.3.4 के तहत यह प्रतिबंध लगाया है।
आदेश के दायरे में तंबाकू और निकोटीन युक्त गुटखा, पान मसाला तथा संबंधित खाद्य उत्पादों का निर्माण, भंडारण, वितरण और बिक्री शामिल है। यह प्रतिबंध केवल खुदरा दुकानों तक सीमित नहीं है, बल्कि निर्माण इकाइयों, गोदामों, थोक विक्रेताओं और वितरण केंद्रों पर भी लागू होता है।
एफएसडीए के अधिकारियों के अनुसार, उत्पाद किसी भी नाम या ब्रांड से बेचा जा रहा हो, यदि वह प्रतिबंध के दायरे में आता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
स्टॉक का क्या करेंगे दुकानदार? सरकार से मोहलत की मांग
प्रतिबंध लागू होने के बाद सबसे बड़ी चिंता दुकानदारों के पास पहले से मौजूद स्टॉक को लेकर है। छोटे किराना दुकानदारों और पान की दुकानों के लिए यह चुनौती अधिक गंभीर हो सकती है, क्योंकि कई कारोबारियों की आय का एक हिस्सा इन उत्पादों की बिक्री से आता है।
व्यापारियों के सामने अब सवाल है कि प्रतिबंधित उत्पादों के मौजूदा स्टॉक का निपटान किस तरह किया जाएगा। प्रतिबंध लागू होने के बाद इन उत्पादों को बेचने की अनुमति नहीं है। ऐसे में व्यापारी स्टॉक वापस लेने, उसे आपूर्तिकर्ताओं को लौटाने या उसके प्रबंधन के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश देने की मांग कर रहे हैं।
देहरादून व्यापार मंडल के महिला प्रकोष्ठ की जिलाध्यक्ष मधु गुप्ता ने सरकार के फैसले का स्वागत किया, लेकिन व्यापारियों की आजीविका पर पड़ने वाले असर को लेकर चिंता भी जताई।
उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य के लिहाज से यह निर्णय अच्छा है, लेकिन व्यापारियों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। उनके मुताबिक, कारोबारियों को पहले से उत्पादों का स्टॉक रखना पड़ता है। ऐसे में प्रतिबंध लागू होने के बाद उन्हें आर्थिक नुकसान से बचाने के लिए सरकार को कुछ मोहलत या उचित व्यवस्था पर विचार करना चाहिए।
एफडीए की छापेमारी शुरू, उल्लंघन पर होगी कार्रवाई
प्रतिबंध के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए एफएसडीए ने 14 अक्टूबर से प्रदेशभर में जांच और छापेमारी अभियान शुरू किया है। अधिकारियों को बाजारों, दुकानों, गोदामों और अन्य संबंधित प्रतिष्ठानों में प्रतिबंधित उत्पादों की बिक्री और भंडारण की जांच करने के निर्देश दिए गए हैं।
एफडीए के अपर आयुक्त ताजबर सिंह जग्गी ने कहा कि तंबाकू और निकोटीन युक्त उत्पादों के सेवन से कैंसर सहित कई गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ता है। इसी को ध्यान में रखते हुए राज्य में एक साल के लिए प्रतिबंध लागू किया गया है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रतिबंधित उत्पादों की बिक्री या अन्य प्रतिबंधित गतिविधियां पाए जाने पर खाद्य सुरक्षा कानून के तहत कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने कारोबारियों से अपील की कि वे प्रतिबंधित उत्पादों को अपने प्रतिष्ठानों से हटा दें, क्योंकि खाद्य सुरक्षा अधिकारी क्षेत्र में जाकर जांच करेंगे।
पहले भी लग चुका है प्रतिबंध, फिर भी बनी रही चुनौती
उत्तराखंड में तंबाकू और निकोटीन युक्त कुछ उत्पादों पर वर्ष 2013, 2015 और 2019 में भी प्रतिबंध लगाए गए थे। इसके बावजूद ऐसे उत्पादों की बिक्री पर प्रभावी नियंत्रण करना चुनौती बना रहा।
इस बार प्रतिबंध के दायरे में निर्माण से लेकर भंडारण, वितरण और बिक्री तक की गतिविधियों को शामिल किया गया है। ऐसे में प्रतिबंध को प्रभावी बनाने के लिए केवल दुकानों पर कार्रवाई करना ही पर्याप्त नहीं होगा। आपूर्ति श्रृंखला से जुड़े सभी स्तरों पर निगरानी की आवश्यकता होगी।
प्रतिबंध के दौरान अवैध बिक्री या चोरी-छिपे कारोबार की आशंका को देखते हुए नियमित निरीक्षण और कानून के तहत कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी।
तंबाकू उत्पादों से करीब 40 करोड़ रुपये के जीएसटी का अनुमान
प्रतिबंध का असर कारोबार के साथ-साथ राजस्व पर भी पड़ सकता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, तंबाकू आधारित उत्पादों से राज्य को सालाना करीब 40 करोड़ रुपये का जीएसटी प्राप्त होता है। इसमें से लगभग 20 करोड़ रुपये राज्य सरकार और इतनी ही राशि केंद्र सरकार को मिलने का अनुमान बताया गया है।
तंबाकू उत्पादों पर जीएसटी के साथ अतिरिक्त उपकर भी लागू होता है। हालांकि, प्रतिबंध से राजस्व पर वास्तविक असर कितना पड़ेगा, यह इन उत्पादों की बिक्री में आई कमी, कर व्यवस्था और अन्य आर्थिक कारकों पर निर्भर करेगा।
इसके अलावा, थोक विक्रेताओं, वितरकों, गोदाम संचालकों और आपूर्ति श्रृंखला से जुड़े अन्य कारोबारियों की आय भी प्रभावित हो सकती है।
कैंसर के बढ़ते मामलों के बीच सरकार का फैसला
तंबाकू के सेवन और कैंसर के बीच संबंध को देखते हुए प्रतिबंध को सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के एक अध्ययन में सिर और गर्दन के कैंसर से जुड़े जोखिमों का विश्लेषण किया गया है। इस अध्ययन में धूम्ररहित तंबाकू के सेवन और होंठ, जीभ तथा मुंह के कैंसर के बीच संबंधों का भी आकलन किया गया।
उपलब्ध अध्ययन विवरण के अनुसार, उत्तराखंड में पुरुषों में होंठ के कैंसर के 53.68 प्रतिशत, जीभ के कैंसर के 24.1 प्रतिशत और मुंह के कैंसर के 49.02 प्रतिशत मामलों के धूम्ररहित तंबाकू के सेवन से जुड़े होने का अनुमान है। महिलाओं में होंठ के कैंसर के लिए यह अनुमान 36.94 प्रतिशत, जीभ के कैंसर के लिए 6.91 प्रतिशत और मुंह के कैंसर के लिए 36.12 प्रतिशत बताया गया है।
ये आंकड़े अध्ययन में इस्तेमाल की गई पद्धति और संबंधित आबादी के संदर्भ में समझे जाने चाहिए। इन्हें राज्य में कैंसर के सभी मामलों का प्रत्यक्ष अनुपात नहीं माना जाना चाहिए।
दून अस्पताल में भी बड़ी संख्या में तंबाकू सेवन करने वाले मरीज
राजकीय दून मेडिकल कॉलेज अस्पताल के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2021 में कैंसर से पीड़ित 66 मरीजों को भर्ती किया गया था। वर्ष 2022 में यह संख्या 269, वर्ष 2023 में 1,116, वर्ष 2024 में 712 और वर्ष 2025 में 944 रही।
अस्पताल के कैंसर रोग विशेषज्ञ डॉ. दौलत सिंह के अनुसार, अस्पताल में इलाज के लिए आने वाले कैंसर मरीजों में लगभग 60 से 65 प्रतिशत किसी न किसी रूप में तंबाकू का सेवन करते रहे हैं। उनके मुताबिक, इन मरीजों में करीब 35 प्रतिशत को मुंह का कैंसर पाया गया है।
डॉ. सिंह ने तंबाकू पर प्रतिबंध के फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि तंबाकू का सेवन कैंसर और अन्य गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ाता है। उन्होंने लोगों को तंबाकू के दुष्परिणामों के प्रति जागरूक करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
जनता ने फैसले का किया स्वागत, अवैध बिक्री पर जताई चिंता
प्रदेश में तंबाकू और निकोटीन युक्त उत्पादों पर प्रतिबंध को लेकर कई लोगों ने फैसले का स्वागत किया है। लोगों का कहना है कि गुटखा और तंबाकू के सेवन से होने वाली बीमारियों को देखते हुए ऐसे उत्पादों की उपलब्धता पर नियंत्रण जरूरी है।
हालांकि, कुछ लोगों ने आशंका जताई कि प्रतिबंध के बावजूद इन उत्पादों की अवैध बिक्री हो सकती है। ऐसे में प्रभावी निगरानी और नियमों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करना जरूरी होगा।
कुछ लोगों ने शराब की बिक्री पर भी नियंत्रण बढ़ाने की मांग उठाई। उनका कहना है कि शराब के सेवन से जुड़ी सामाजिक और सड़क सुरक्षा संबंधी समस्याओं पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।
अब स्टॉक प्रबंधन और प्रतिबंध के पालन पर रहेगी नजर
उत्तराखंड में एक साल के प्रतिबंध के लागू होने के बाद अब एफएसडीए के सामने इसे प्रभावी ढंग से लागू कराने की चुनौती है। एक ओर सरकार तंबाकू से होने वाले स्वास्थ्य नुकसान को कम करना चाहती है, वहीं दूसरी ओर छोटे व्यापारियों के मौजूदा स्टॉक और आजीविका से जुड़े सवाल भी सामने हैं।
आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रतिबंधित उत्पादों की आपूर्ति और बिक्री पर कितना नियंत्रण हो पाता है, नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ क्या कार्रवाई होती है और मौजूदा स्टॉक के प्रबंधन को लेकर व्यापारियों को कोई अतिरिक्त दिशा-निर्देश दिए जाते हैं या नहीं।