

मालू और विस्कोस से तैयार किया गया मिश्रित कपड़ा
यह शोध विश्वविद्यालय के सामुदायिक विज्ञान महाविद्यालय की पूर्व पीएचडी छात्रा और वर्तमान में राष्ट्रीय फैशन प्रौद्योगिकी संस्थान (निफ्ट), जोधपुर में सहायक प्राध्यापक डॉ. रुचि खोलिया ने किया है। महाविद्यालय की अधिष्ठात्री प्रो. अलका गोयल के मार्गदर्शन में किए गए इस शोध में मालू के रेशों को अलग करने और उन्हें विस्कोस रेयान के साथ मिलाकर नवीन मिश्रित कपड़ा विकसित करने पर काम किया गया।
इस तकनीक के माध्यम से मालू के प्राकृतिक रेशों को वस्त्र निर्माण के लिए उपयोगी बनाया गया है। इससे घरेलू साज-सज्जा, फर्निशिंग फैब्रिक और अन्य टेक्सटाइल उत्पादों के निर्माण में पर्यावरण अनुकूल विकल्प विकसित करने की संभावनाएं बढ़ेंगी।
ग्रामीण महिलाओं और स्वयं सहायता समूहों को मिलेगा लाभ
डॉ. रुचि खोलिया के अनुसार, मालू के रेशों के निष्कर्षण और प्रसंस्करण पर आधारित लघु एवं कुटीर उद्योग पर्वतीय क्षेत्रों में रोजगार सृजन का प्रभावी माध्यम बन सकते हैं। कम लागत में इन गतिविधियों को शुरू कर ग्रामीण महिलाओं और स्वयं सहायता समूहों के लिए स्वरोजगार के अवसर विकसित किए जा सकते हैं।
इस पहल से स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर उपयोग होने के साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलने की उम्मीद है। साथ ही, पहाड़ों में स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ने से पलायन की समस्या को कम करने में भी मदद मिल सकती है।
औषधीय उपयोग के लिए भी जाना जाता है मालू
मालू, जिसे अंग्रेजी में कैमल्स फुट क्लाइंबर भी कहा जाता है, पारंपरिक रूप से विभिन्न उपयोगों के लिए जाना जाता है। डॉ. रुचि के अनुसार, इसके पत्तों का उपयोग रक्त शर्करा के नियंत्रण से जुड़े पारंपरिक उपायों में किया जाता है, जबकि इसके बीजों का इस्तेमाल स्वास्थ्यवर्धक टॉनिक के रूप में भी बताया जाता है। हालांकि, इन औषधीय उपयोगों की प्रभावशीलता और सुरक्षा के लिए वैज्ञानिक प्रमाणों का मूल्यांकन जरूरी है।
मालू के रेशों को वस्त्र निर्माण में इस्तेमाल करने की यह पहल पर्वतीय वनस्पतियों के बहुआयामी और टिकाऊ उपयोग की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इससे अब तक सीमित उपयोग में आने वाले इस प्राकृतिक संसाधन को नए औद्योगिक और आर्थिक अवसरों से जोड़ने की राह खुल सकती है।
हरित तकनीक और सतत विकास को मिलेगा बढ़ावा
पंतनगर विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. एसके कश्यप ने इस नवाचार को हरित प्रौद्योगिकी, सतत फैशन और ग्रामीण सशक्तिकरण के लक्ष्यों के अनुरूप बताया। उन्होंने कहा कि स्थानीय वनस्पतियों को व्यावसायिक वस्त्र उत्पादों में बदलने से शैक्षणिक अनुसंधान, पर्यावरण संरक्षण और सामुदायिक विकास के बीच बेहतर तालमेल स्थापित किया जा सकता है।
मालू के रेशों से कपड़ा तैयार करने की यह तकनीक यदि व्यावसायिक स्तर पर सफलतापूर्वक अपनाई जाती है, तो उत्तराखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में नए लघु उद्योगों के विकास, स्थानीय संसाधनों के मूल्यवर्धन और रोजगार के अवसर बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकती है।