देहरादून: दीवान कनवाल, जो उत्तराखंड के प्रसिद्ध कुमाऊंनी लोकगायक थे, का बुधवार सुबह उनके खत्याड़ी स्थित आवास पर निधन हो गया। वह मूल रूप से अल्मोड़ा जिले के निवासी थे। उनके निधन की खबर मिलते ही लोक कलाकारों और संगीत प्रेमियों में शोक की लहर दौड़ गई। उनका अंतिम संस्कार बेतालेश्वर घाट पर किया जाएगा।

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी लोकगायक दीवान कनवाल के निधन पर गहरा दुःख व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि दीवान कनवाल ने उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति और लोक संगीत को नई पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। मुख्यमंत्री ने इसे राज्य की लोक कला और सांस्कृतिक जगत के लिए अपूरणीय क्षति बताया और दिवंगत आत्मा की शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना की। साथ ही उन्होंने शोक संतप्त परिवार और प्रशंसकों को इस दुख को सहने की शक्ति देने की कामना की।
मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी ने प्रसिद्ध लोक कलाकार श्री दीवान कनवाल के निधन पर गहरा दुःख व्यक्त किया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि श्री कनवाल ने उत्तराखण्ड की समृद्ध लोक संस्कृति और लोक संगीत को नई पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
मुख्यमंत्री श्री धामी ने कहा कि श्री…
— CM Office Uttarakhand (@ukcmo) March 11, 2026
वहीं उत्तराखंड के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह (सेवानिवृत्त) ने भी दीवान कनवाल के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए परिजनों के प्रति संवेदना प्रकट की। इसके अलावा अल्मोड़ा के पूर्व विधायक रघुनाथ सिंह चौहान ने भी उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।
लोकगायक दीवान कनवाल का लोकप्रिय गीत “द्वी दिना का ड्यार शेरुवा यौ दुनी में” आज भी लोगों की जुबान पर है। उनकी उम्र करीब 65 वर्ष थी और बताया जा रहा है कि वह पिछले कुछ समय से बीमार चल रहे थे। उनका इलाज हल्द्वानी के एक निजी अस्पताल में चल रहा था। इसके बाद वह अपने खत्याड़ी स्थित घर पर स्वास्थ्य लाभ कर रहे थे, लेकिन बुधवार सुबह करीब चार बजे उन्होंने अंतिम सांस ली।
दीवान कनवाल के परिवार में दो बेटे और दो बेटियां हैं। उनका बड़ा बेटा अल्मोड़ा में निजी नौकरी करता है, जबकि छोटा बेटा मुंबई में कार्यरत है। उनकी पत्नी का कई वर्ष पहले ही निधन हो चुका था। वर्तमान में उनके घर में उनकी वृद्ध मां और बड़ा बेटा रहते हैं।
जिला सहकारी बैंक से सेवानिवृत्त होने के बाद दीवान कनवाल पूरी तरह लोकगीतों के सृजन में जुट गए थे। बीते वर्ष उन्होंने “शेर दा अनपढ़” की याद ताजा करता एक गीत भी रचा, जिसे लोगों ने काफी पसंद किया। उनके गीतों में जीवन की क्षणभंगुरता और पहाड़ की संवेदनाओं को बेहद भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया जाता था।
लोक समुदाय का कहना है कि दीवान कनवाल की रचनाएं कुमाऊंनी संस्कृति की अमूल्य धरोहर हैं और उनका योगदान हमेशा याद रखा जाएगा।