देहरादून: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने दो वकीलों के बीच वैवाहिक विवाद से जुड़े मामले में देहरादून फैमिली कोर्ट के तलाक के फैसले को बरकरार रखा है। कोर्ट ने माना कि लगातार अपमान, निजी और पेशेवर फैसलों को लेकर दबाव तथा पति को उसके परिवार से दूर करने के कथित प्रयासों का संचयी प्रभाव मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है।

मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने पत्नी की ओर से दायर पहली अपील खारिज करते हुए कहा कि पति मानसिक क्रूरता के आधार को साबित करने में सफल रहा। इसके साथ ही कोर्ट ने नाबालिग बेटी की देखभाल और शिक्षा के लिए पति को 70 लाख रुपये तथा पत्नी को 40 लाख रुपये स्थायी गुजारा-भत्ता देने का निर्देश दिया।
2014 में हुआ था विवाह, 2016 से अलग रह रहे थे
मामले के अनुसार, दोनों पक्ष कानूनी पेशे से जुड़े हैं। पत्नी पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में अतिरिक्त महाधिवक्ता (Additional Advocate General) रह चुकी हैं, जबकि पति दिल्ली की एक कॉरपोरेट लॉ फर्म से जुड़े वकील हैं।
दोनों का विवाह 3 मार्च 2014 को हुआ था। सितंबर 2015 में उनकी एक बेटी का जन्म हुआ। अदालत के रिकॉर्ड के मुताबिक, दंपती अप्रैल 2016 से अलग रह रहे हैं। इसके बाद नवंबर 2016 में पति ने हिंदू विवाह अधिनियम के तहत मानसिक क्रूरता और परित्याग के आधार पर तलाक की याचिका दायर की थी।
देहरादून फैमिली कोर्ट ने 5 अप्रैल 2024 को पति के पक्ष में तलाक की डिक्री पारित की थी। इस फैसले के खिलाफ पत्नी ने हाईकोर्ट में अपील दायर की।
पति ने लगाए थे अपमान और दबाव के आरोप
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान पति की ओर से आरोप लगाया गया कि पत्नी ने कई मौकों पर उनके, उनके माता-पिता, रिश्तेदारों और परिचितों के साथ दुर्व्यवहार किया। यह भी आरोप लगाया गया कि पत्नी उन पर दिल्ली की कॉरपोरेट लॉ की नौकरी छोड़कर चंडीगढ़ आने का दबाव डालती थीं और उन्हें उनके माता-पिता से अलग करने का प्रयास करती थीं।
पति की ओर से उनके अलावा उनके माता-पिता और एक अन्य वकील को गवाह के रूप में पेश किया गया। वहीं, पत्नी ने भी स्वयं गवाही दी।
हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों और उपलब्ध साक्ष्यों की समीक्षा के बाद फैमिली कोर्ट के निष्कर्षों में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
‘सिर्फ वैचारिक मतभेद’ की दलील से कोर्ट असहमत
पत्नी की ओर से दलील दी गई कि दोनों के बीच हुए विवाद सामान्य वैवाहिक मतभेद थे और उन्हें मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता। हालांकि, हाईकोर्ट ने घटनाओं को अलग-अलग देखने के बजाय पूरे वैवाहिक संबंध के दौरान सामने आए आचरण के संचयी प्रभाव पर विचार किया।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सामान्य वैचारिक मतभेद या कभी-कभार होने वाले वैवाहिक विवाद अपने आप में मानसिक क्रूरता नहीं बनते। लेकिन इस मामले में लगातार अपमान, पेशेवर और निजी मामलों में दबाव तथा परिवार से अलग करने के कथित प्रयासों को समग्र रूप से देखा गया।
सहकर्मियों के सामने अपमान को भी माना महत्वपूर्ण
हाईकोर्ट ने यह भी माना कि किसी व्यक्ति को उसके सहकर्मियों या परिचितों के सामने बार-बार अपमानित किए जाने का उसकी गरिमा और मानसिक स्थिति पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
कोर्ट ने दोनों पक्षों के वकालत के पेशे से जुड़े होने के तथ्य को भी ध्यान में रखा। उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर खंडपीठ ने माना कि साबित हुआ आचरण सामान्य वैवाहिक मतभेदों की सीमा से आगे जाता है और मानसिक क्रूरता की कानूनी कसौटी को पूरा करता है।
बेटी की कस्टडी मां के पास, पिता को मुलाकात का अधिकार
हाईकोर्ट ने नाबालिग बेटी की देखभाल और कस्टडी मां के पास ही रखने का निर्देश दिया। साथ ही पिता के अपनी बेटी से मिलने और उसके जीवन में अभिभावकीय भूमिका निभाने के अधिकार को भी मान्यता दी।
वित्तीय राहत के तहत कोर्ट ने पति को बेटी की देखभाल और शिक्षा के लिए 70 लाख रुपये की एकमुश्त राशि देने का निर्देश दिया। इसके अलावा पत्नी को 40 लाख रुपये स्थायी गुजारा-भत्ता देने का आदेश दिया गया। दोनों मदों को मिलाकर कुल राशि 1.10 करोड़ रुपये है।
करीब आठ साल से अलग रह रहा था दंपती
अदालत ने इस तथ्य पर भी गौर किया कि दोनों पक्ष अप्रैल 2016 से अलग रह रहे हैं और लंबे समय से उनके बीच कानूनी विवाद चल रहा है। वैवाहिक संबंध बहाल करने के लिए सुलह के प्रयास भी किए गए, लेकिन वे सफल नहीं हो सके।
इन परिस्थितियों और मामले में सामने आए साक्ष्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने पत्नी की अपील खारिज कर दी और 5 अप्रैल 2024 को देहरादून फैमिली कोर्ट द्वारा पारित तलाक के फैसले को बरकरार रखा।