देहरादून: किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना के प्रस्तावित डूब क्षेत्र को लेकर उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में विस्तृत सर्वेक्षण की प्रक्रिया शुरू हो गई है। सर्वे के जरिए यह पता लगाया जाएगा कि प्रस्तावित किशाऊ बांध की झील में कितनी भूमि डूब क्षेत्र में आएगी, कौन-कौन से खसरे प्रभावित होंगे और वहां कितनी संपत्तियां व अन्य संरचनाएं मौजूद हैं। इन सभी का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया जाएगा।

किशाऊ कॉरपोरेशन लिमिटेड ने दोनों राज्यों में प्रस्तावित डूब क्षेत्र की निजी, राजस्व और वन भूमि के भौतिक सर्वेक्षण की प्रक्रिया शुरू की है। मौके पर भूमि की वास्तविक स्थिति का सत्यापन करने के साथ खसरा आधारित नक्शों को डिजिटल स्वरूप दिया जाएगा।
भूमि के साथ भवनों और संपत्तियों की भी होगी मैपिंग
सर्वेक्षण में सिर्फ जमीन की पैमाइश नहीं की जाएगी, बल्कि डूब क्षेत्र में आने वाले भवनों, संपत्तियों और अन्य संरचनाओं को भी चिह्नित किया जाएगा। इससे परियोजना से प्रभावित होने वाली भूमि और संपत्तियों का विस्तृत एवं सटीक रिकॉर्ड तैयार हो सकेगा।
उत्तराखंड जल विद्युत निगम के प्रबंध निदेशक एके सिंह के अनुसार, जमीन की मौजूदा स्थिति को डिजिटल रिकॉर्ड में दर्ज करने से परियोजना की आगामी प्रक्रियाओं के लिए आवश्यक आधारभूत जानकारी उपलब्ध होगी।
उत्तराखंड की दो तहसीलों में सर्वे
उत्तराखंड में किशाऊ परियोजना के प्रस्तावित डूब क्षेत्र का सर्वे देहरादून जिले की चकराता और त्यूणी तहसीलों में किया जाएगा।
हिमाचल प्रदेश में सर्वेक्षण सिरमौर जिले की शिलाई और शिमला जिले की चौपाल तहसील में प्रस्तावित है।
सर्वेक्षण कार्य की अनुमानित लागत उत्तराखंड में 19.90 लाख रुपये, जबकि हिमाचल प्रदेश में 19.99 लाख रुपये रखी गई है।
422 मेगावाट बिजली उत्पादन की योजना
किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना के संशोधित स्वरूप में 422 मेगावाट बिजली उत्पादन प्रस्तावित है। परियोजना में चार इकाइयां होंगी और प्रत्येक इकाई की क्षमता 105.5 मेगावाट होगी।
इसके अलावा परियोजना से 1,324 मिलियन घन मीटर उपयोगी पानी उपलब्ध कराने का प्रावधान है। प्रस्तावित जल हिस्सेदारी के तहत हरियाणा को 633, उत्तर प्रदेश को 411, राजस्थान को 124, दिल्ली को 80, हिमाचल प्रदेश को 42 और उत्तराखंड को 34 मिलियन घन मीटर पानी मिलने का प्रावधान है।
सर्वे पूरा होने के बाद सामने आएगा डूब क्षेत्र का विस्तृत आंकड़ा
किशाऊ परियोजना के लिए प्रस्तावित यह सर्वेक्षण डूब क्षेत्र की वास्तविक स्थिति दर्ज करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। सर्वे पूरा होने के बाद प्रभावित होने वाली भूमि, खसरों, संपत्तियों और संरचनाओं का अधिक विस्तृत डिजिटल रिकॉर्ड उपलब्ध होगा।
यह रिकॉर्ड परियोजना से जुड़ी आगे की प्रशासनिक, तकनीकी और भूमि संबंधी प्रक्रियाओं के लिए आधार के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकेगा।