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Friday, April 12, 2024

पानी सिर के ऊपर निकलने से पहले अभिभावक नाबालिगों को समझाएं यह बात

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उत्तराखंड न्यूज़ एक्सप्रेस के इस समाचार को सुनें
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युवाओं को गुमराह कर सबको युवा नेता बना देने का झांसा देने का एक नया दौर बड़ी तेजी से चला है।
अब से करीब कुछ साल पहले नेता जी के साथ 35+ उम्र वाले लोग पूल, पुलिया, नाला, प्रधानी, बीडीसी व सदस्य आदि थाना में हनक के लिये घूमते थे पीछे पीछे.

लेकिन अब हाई स्कूल एवं इंटरमीडिएट में पढ़ने वाले नाबालिग बच्चे नेता जी के साथ घूमने वाले लोगो के पीछे हैं और अंधकार में अपना भविष्य तलाश रहे हैं। नेता जी का संगठन किसी युवा बच्चे को सचिव तो किसी को अध्यक्ष तो किसी को उपाधक्ष बनाकर अपना उल्लू सीधे कर रहे है.

रेस्टोरेंट का नास्ता, स्कॉर्पियो की सीट और जगह जगह दुग्गी क्रिकेट का उद्दघाटन करते समय नेताजी के साथ की फोटो इन बच्चों को सपनो की रंगीन दुनिया मे पहुँचा दे रहा। ऊपर से इनके नाम लिखे फर्जी संगठन वाले बैनर लगने और पेपर में नाम फ़ोटो छप जाने का सुख तो जैसे इनके लिए प्रसिद्धि नही, सच में पार्टी सचिव/ महासचिव/अध्यक्ष जैसे पदों से उछलकर सीधे संसद की कुर्सी पर बैठने जैसा है.

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कुछ बुजुर्ग लोगों की ज़िंदगी तो नेता जी के आगे पीछे घूमते घूमते ऐसी स्थिति में आ चुकी है कि चाह कर भी वे न नेता से आगे निकल सकते हैं न ही कोई धंधा पानी रोजगार करके दो पैसा अपने एवं परिवार के लिए कमा सकते है।

लेकिन बच्चों की जो जिंदगी अभी बची है. पानी सिर से ऊपर निकलने के पहले सम्भालिये. जिस उम्र में इन नालायको को अपने कैरियर भविष्य पर ध्यान देना चाहिये इन्हें समाजसेवा का परवाना चढ़ा है वो भी पिताजी के पैसे से, दलाली से, नेता जी की गुलामी से.
अभिभावकों से निवेदन है कि इन बच्चों को समझाइये कि नेतागीरी और दलाली को आय का ज़रिया बनाने के बजाय, पढ़ लिखकर कुछ आय का अच्छा स्रोत बना लें फ़िर करें समाजसेवा और नेतागिरी.

अगर अभिभावक आज नही रोक पाये इस ट्रेंड को तो कल को आपका खेत, मकान बेचकर, लोन कराकर यही लड़के जिंदगी जियेंगे, क्योंकि ये सब के सब नेता तो नहीं बन पाएँगे, वजह—ऊपर वाले नेताजी के लाइन में ये सबसे नीचे की कड़ियाँ हैं जिनका एकमात्र काम उपयोग होना है

समझाइये इन्हें कि ये समय फिजिक्स, केमेस्ट्री, बायो, इकोनोमिक्स, हिस्ट्री, ज्योग्राफी, मैथ्स, हिंदी, इंग्लिश के शब्दों, थिअरिज,प्रैक्टिकल्स को अपने कानों में बैठाकर दिमाग मे घुसाने का है न कि अपने कानों को..भैया भैया भैया सुनने का अभ्यस्त बनाने का है।
भविष्य में यही लोग बोझ बनते हैं देश, समाज, परिवार पर.
अन्यथा 20 साल बाद बच्चे सोचेंगे कि काश उस समय कुछ और कर लिया होता,
और अभिवावक सोचेंगे अब क्या हो??

कुंवर सिंह बगड़वाल

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